संपादक: विजय पंवार
रुद्रप्रयाग। देवभूमि उत्तराखंड अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, रीति-रिवाजों और लोक परंपराओं के लिए देशभर में अपनी अलग पहचान रखता है। बदलते परिवेश और आधुनिक जीवनशैली के चलते पहाड़ की कई पारंपरिक परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। इन्हीं लोक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में रुद्रप्रयाग के कोठगी-भटवाड़ी गांव में एक अनूठी पहल की शुरुआत की गई।
जनपद रुद्रप्रयाग के विकासखंड अगस्त्यमुनि के कोठगी-भटवाड़ी गांव में शिक्षक एवं पर्यावरण प्रेमी सत्येंद्र भंडारी के घर से शुभ-मांगलिक कार्यों में मालू घास के पत्तों से दोने-पत्तल तैयार करने की पारंपरिक पहल शुरू हुई। ग्रामीणों ने जंगल से मालू घास के पत्ते एकत्र कर उन्हें घर के आंगन में बैठकर पारंपरिक तरीके से दोने-पत्तल (पत्तल-पुड़खे) का रूप दिया।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले पहाड़ों में शादी-विवाह और अन्य शुभ-मांगलिक आयोजनों में इसी तरह स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों से तैयार पत्तल और दोने का प्रयोग किया जाता था। लेकिन आधुनिक समय में प्लास्टिक से बने दोने-पत्तल और अन्य सामग्री का उपयोग तेजी से बढ़ा है, जिससे पर्यावरण के साथ-साथ स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
मालू घास से तैयार दोने-पत्तल प्राकृतिक एवं पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ ही पहाड़ की पारंपरिक संस्कृति को जीवित रखने का माध्यम भी बन सकते हैं। इसके साथ ही यदि इस परंपरा को व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया जाए तो यह ग्रामीणों के लिए रोजगार और ग्रामीण आर्थिकी को मजबूत करने का आधार भी बन सकती है।
शिक्षक सत्येंद्र भंडारी और ग्रामीणों की यह पहल उत्तराखंड की विलुप्त होती लोक परंपराओं को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक सराहनीय कदम माना जा रहा है। स्थानीय लोगों ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में इस पारंपरिक पद्धति को और अधिक प्रोत्साहन मिलेगा।
इस विशेष पारंपरिक आयोजन के अवसर पर रघुवीर सिंह चौहान, भीम सिंह जगवाण, मानवेंद्र सिंह नेगी, पूर्ण सिंह चौहान, विक्रम सिंह रौतेला, भरत सिंह जगवाण, योगम्बर सिंह मिंगवाल, दिगंबर सिंह मिंगवाल, आनंद सिंह रौथाण, विक्रम सिंह भंडारी, अमीषा बिष्ट, सुनील भंडारी, वैशाख सिंह, अनीता देवी भंडारी, रामेश्वरी देवी, उर्मिला देवी, मथुरा देवी, राजेश्वरी देवी, अजय आनंद नेगी सहित कई ग्रामीण मौजूद रहे।
