
संपादकीय | दून वाणी
होली केवल रंगों और उत्साह का त्योहार नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की गहरी सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक एकता का प्रतीक है। विविधताओं से भरे हमारे देश में होली ऐसा अवसर लेकर आती है, जब भेदभाव की दीवारें कुछ समय के लिए ही सही, लेकिन कमजोर पड़ जाती हैं।
रंगों का यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि समाज की वास्तविक शक्ति उसकी एकजुटता में निहित है। जब लोग एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, तो यह केवल परंपरा का निर्वाह नहीं होता, बल्कि यह स्वीकार्यता और समानता का प्रतीक बन जाता है। सामाजिक अभियांत्रिकी के दृष्टिकोण से देखें तो होली एक ऐसा सांस्कृतिक माध्यम है, जो सामाजिक दूरी को कम कर सामूहिक पहचान को मजबूत करता है।
होली का संदेश है—मन की कड़वाहट को त्यागकर रिश्तों में नई ऊर्जा भरना। यह त्योहार हमें बताता है कि सामाजिक समरसता केवल कानूनों या नीतियों से नहीं आती, बल्कि आपसी विश्वास, संवाद और सहभागिता से बनती है। जब समाज के विभिन्न वर्ग एक साथ उत्सव मनाते हैं, तो सामाजिक ताने-बाने में मजबूती आती है।
हालांकि आधुनिक समय में यह भी आवश्यक है कि उत्सव मर्यादित और जिम्मेदार तरीके से मनाया जाए। किसी की भावनाओं को आहत किए बिना, पर्यावरण का ध्यान रखते हुए और पारस्परिक सम्मान के साथ होली मनाना ही सच्चे अर्थों में इस पर्व की गरिमा को बनाए रखना है।
देहरादून जैसे सांस्कृतिक और शैक्षिक नगर में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और भाईचारे को पुनर्स्थापित करने का अवसर भी है।
इस होली पर हम सब संकल्प लें कि रंग केवल चेहरों पर नहीं, बल्कि दिलों में भी उतरें — और समाज में प्रेम, विश्वास और एकता के रंग पूरे वर्ष बने रहें।
होली की शुभकामनाएं।
— विजय पंवार
संपादक, दून वाणी
